चोर की आत्मा को कदापि शांति नहीं मिलती- ड़ॉ अर्पिता

चित्तौड़गढ़, (सलमान)। श्रमण संघीय आचार्य सम्राट डाॅ.शिवमुनि की आज्ञानुवर्ती उपप्रवर्तिनी वीरकान्ता की सुशिष्या डाॅ. अर्पिता ने अदत्तादान महापाप के अतिचार एवं आलोचना व अचौर्य व्रत आराधना के परिणामों का विवेचन करते हुए बताया कि अचौर्य व्रत की आराधना करके आत्मा को पवित्र बना लेता है। चोरी के प्रत्यक्ष परिणाम इस भव में भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होते हैं और परलोक में नरक गति के रूप में भुगतने पड़ते हैं। चोर की आत्मा को कदापि शांति नहीं मिलती है। हर समय चिन्तातुर रहता है, दया प्रेम उससे कोसों दूर रहते हैं। यह क्रूर नृशंस निर्लज्ज और हत्यारा हो जाता है। अतः आत्मा की उन्नति चाहने वाली आत्मा चोरी का त्याग करता है।
उन्होंने उपासक दशांग सूत्र में अस्तैय व्रत के पाँच अतिचार बताये जो जानने योग्य है पर आचरण करने योग्य नहीं है। पहला है स्तेनाव्रत अर्थात् चोर द्वारा चोरी हुई वस्तुओ को लोभवश ग्रहण करना। राज्य व्यवस्था में भी जानबूझ कर चोरी का माल खरीदने वाला भी दण्डनीय अपराध है। बाजार में अत्यधिक सस्ता माल बिकने की पूर्ण गवेषणा करनी चाहिये और इस पाप से बचना चाहिये। दूसरा अतिचार है तस्कर प्रयोग- चोरी करने वाला, चोरी की प्रेरणा देने वाला, चोरी की सलाह देने वाला, चोरी के लिए भेद बताने वाला, चोरी का माल खरीदने वाला, चोरी के लिए साधन देने वाला और चोर को आश्रय देने वालों की गणना भी चोरों में की गई है। श्रावक को इससे बचना चाहिये।
तीसरा अतिचार विरूद्ध राज्यातिक्रम - परस्पर विरोधी राज्य, शत्रु राज्य, युद्धरत राज्य को विरूद्ध राज्य कहते हैं। ऐसे राज्यों की सीमा का अतिक्रमण करने, राज्य और धर्म की मर्यादा भंग होती है और दण्डनीय भी है। राज्य की सुविधा के लिए उल्लंघन करने में श्रावक को पूरी सावधानी रखनी चाहिये।
चौथा अतिचार कूट तुला कूट माप - जानबूझकर लोभ के वशीभूत अधिक लेने व कम देने की नीयत से तौलने व मापने के बाट, माप, तुला आदि कम ज्यादा रखना भी अतिचार है और राज्य अपराध है। नाप तौल में अप्रमाणिकता करना, देने लेने के दोहरे मापदण्ड रखना व्यावसायिक चोरी है, ठगाई है और नैतिक पतन है। जो व्यक्ति इतनी भी नैतिकता नहीं रख सकता वह श्रावक बनने का अधिकारी नहीं बन सकता। तत्प्रतिरूपक व्यवहार- किसी अच्छी चीज में हल्की वस्तु को सम्मिश्रण करके उसे अच्छी कह कर बेचना तथा नमूने की अच्छी चीज बताकर हल्की चीज देना। सोना चांदी में ताम्बे की मिलावट कर उसे खरे रूप में बेचाा जाकर ग्राहकों के साथ भयंकर ठगाई की जाती है। खाद्य पदार्थों, खाद बीज, दवाईयों में मिलावट, नकली दवाईयां बेचकर लालची, निर्दयी लोग इंसानी जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। निन्दनीय चोरी, ठगी और बेईमानी है। जो दण्डनीय तो है ही धार्मिक दृष्टि से भी पतन की पराकाष्ठा है।
उन्होंने कहा कि धन सम्पति और अपनी वस्तुएँ जीव को जीवन जैसी प्रिय है। उनका हरण होने से जीव का मरणान्तक कष्ट होता है। सम्पति का हरण करने वाला सम्पति ही नहीं हरता वरन् धरम करम, धैर्य और शांति भी चुरा लेता है। द्रव्य चोरी की तरह भाव चोरी भी भयंकर पाप है। यशकीर्ति और प्रशंसा की कामना से दूसरे के गुणों की चोरी नहीं करनी चाहिये। अत्यधिक संग्रह वृति भी भाव चोरी है। श्रावक को इससे बचना चाहिये।
उन्होंने कहा कि पाप की कमाई हजम नहीं होती। शास्त्रानुसार हद से हद 12 वर्ष तक आनन्द ले सकते हैं। उसके बाद उसका पतन निश्चित है। ज्यादा भाव बताकर सौदेबाजी कर कम दाम में बेचना, खाने पीने के सामान का साथियों में शेयर नहीं करना, क्षमता होते हुए भी तप, स्वाध्याय, ज्ञानार्जन नहीं करना भी चोरी है।
उतराध्यायन सूत्र में भगवान फरमाते हैं कि हम जो पाप-चोरी करते हैं, स्वयं के लिए नहीं वरन परिवार के लिए करते हैं परन्तु इसका दण्ड हमें ही भुगतना पड़ेगा। अतः श्रावक चोरी के पाप की आलोचना करें, सद्बुद्धि की प्रार्थना करें, दान करें, साधर्मी की सहायता कर पाप का प्रायश्चित करें और पापमय संसार को छोड़कर श्रमण निग्रन्थ बनने की भावना करें।
संघ अध्यक्ष लक्ष्मीलाल चण्डालिया ने बताया कि आयम्बिल, उपवास, एकासन, तपस्या निरन्तर गतिमान है। बड़ी तपस्या के क्रम में आज ममता खमेसरा ने नो उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किये। नवकार जाप प्रभारी सरोज नाहर ने बताया कि 22 जुलाई के अखण्ड जाप प्रातः 8 बजे से रात्रि 8 बजे तक ओमप्रकाश पीयूष कुमार गोखरू के डी-3, पंचवटी स्थित आवास पर रहेंगे। संचालन अभयसिंह संचेती ने किया।

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