चित्तौड़गढ़। प्राणी मात्र कके जीवन का आधार अन्न और जल है। जल से महासागर, सरोवर भरे पड़े हैं। बरसात से जल मिल जाता है परन्तु अन्न नहीं मिलता। बाढ़ जल की ही आती है अन्न की नहीं। अन्न उगाना पड़ता है और पैसों से खरीदा बेचा जाता है। अतः परमात्मा ने पहला पुण्य अन्न को बताया है। शरीर का आधार अन्न ही है, जीवन जीने का आधार आहार ही है। जिस प्रकार अग्नि का आधार ईंधन है वैसे ही शरीर का आधार भी अन्न है। ये विचार विचार श्रमण संघीय उपप्रवर्तिनी श्री वीरकान्ता जी की सुशिष्या साध्वी डाॅ. अर्पिता ने शांति भवन में पुण्य विषयक प्रवचन के दौरान व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि जो बहुत निर्धन है उनकी किस्मत में भोजन की भारी अन्तराय है। ऐसे लोगों को अन्न या तो पैसे से मिलता है या दान से। सुकाल में भी पशु को चारा मुफ्त में मिल जाता है पर मनुष्यों को वह भी नहीं मिलता। अगर चुरा कर क्षुधा शान्त करता है तो दण्ड मिलता है, मांग कर खाता तो सम्मान, स्वाीिामान पर चोट लगती है और बिना मांगे दान भी नहीं मिलता, इसलिए परमात्मा ने अन्न पुण्य को प्रथम स्थान पर रखा है। भूखे मनुष्य को भोजन कराना अन्न पूण्य का अर्जन करना है। पेट की आग सब पाप कराती है मनुष्य इस हेतु सभी प्रकार के दुष्कर्म, कुकर्म पाप करता है। संसार में पाप न बढ़े, दुराचार न बढ़े, इसलिए परमात्मा ने पुण्य का विधान किया है। पुण्य तीन कारणों से किया जाता करूणा, प्रेरि,त पुण्य प्रेरित और अहं प्रेरित। दया करूणा अनुकम्पा से किया गया दान निष्काम और निस्वार्थ होता है। ऐसे दान से परलोक सुधरता है यहाँ तक कि सुपात्र दान से तीर्थ कर गौत्र का भी बन्ध हो जाता है। जो दान अहंकार पुष्टि के लिए यिका जाता है वह निकृष्ट दान है। पारिवारिक व सामाजिक संस्कारों से दिया जाने वाला दान परलौकिक कामना से जुड़ा होने से सापेक्ष दान है, क्योंकि इसमें पारलौकिक कामना जुड़ी हुई है। अन्नदान चाहे निष्काम भाव से हो अथवा आगामी पुण्य बढ़ाने के भाव से हो अनन्दान जैसे श्रेष्ठ दान को जीवन में अपनान्त चाहिये। इससे निर्धन अशक्त व्यक्ति मौत के मुँह में जाने से तो बचेगा ही धरती पर कुकर्म नहीं होंगे, पाप का भार नहीं बढ़ेगा। भुखा व्यक्ति धर्म कर्म सब भूल जाता है, भूखे पेट भजन भी न होवे लोकोक्ति के माध्यम से उन्होंने बताया कि भूख से पीड़ित ऐसा कौनसा पाप है जो न कर बैठे इसलिए आहार दान का अत्यन्त महतव है। ऐतिहासिक उदाहरणों से उन्होंने बताया कि दीर्घ अकाल के समय जब लाखों रुपये देकर भी अन्न नहीं मिलता था झगडू शाह जैसे श्रावकों ने 12 वर्ष तक अहर्निश दान शालाऐं खोल कर धन का सदुपयोग किया और पुण्य बन्ध किया। जिस देश का अन्न जल कुशल रहता है उस देश के नागरिक कुशल रहते है। अन्न दान में भावना का सबसे ज्यादा महत्व है। अन्न दान देकर उसे भुला देना ही श्रेष्ठ है।
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