चित्तौड़गढ़ निकाय चुनाव : क्या 'कुकर' बिगाड़ेगा बीजेपी का खेल..? दोनों को भीतरीघात का अंदेशा.!


चित्तौड़गढ़, माय सर्कल न्यूज, सलमान। चित्तौड़गढ़ में नगर निकाय चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही राजनीतिक पारा चढ़ चुका है। एक तरफ जहां कांग्रेस अंदरूनी गुटबाजी के भंवर में फंसी नजर आ रही है, वहीं बीजेपी के लिए भी राह आसान नहीं दिख रही। गत विधानसभा चुनाव में 'कुकर' के निशान पर चुनाव लड़कर जीत दर्ज करने वाले और फिर बीजेपी के पाले में आए विधायक के समर्थकों और मूल बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच की दूरी घटने का नाम नहीं ले रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या निकाय चुनाव में कुकर और बीजेपी एक ही गाड़ी पर सवार हो पाएंगे या फिर अंदरूनी टीस और गुटबाजी एक बार फिर पार्टी का समीकरण बिगाड़ेगी..? चित्तौड़गढ़ की सियासत में विधानसभा चुनाव के करीब तीन साल बाद एक बार फिर शह और मात का खेल शुरू होने वाला है। विधानसभा चुनाव में बागी होकर कुकर के निशान पर निर्दलीय जीत दर्ज करने वाले विधायक भले ही लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी में शामिल हो गए हों, लेकिन धरातल पर कई कार्यकर्ताओं के बीच बनी टीस आज भी जल रही है। चुनाव में आमने-सामने लड़े कार्यकर्ता आज भी एक-दूसरे की मौजूदगी को दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। हाल ही में हुए कार्यकारिणी विस्तार में जगह न मिलने को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच जो जुबानी जंग छिड़ी, उसने इस मनमुटाव को जगजाहिर कर दिया। सूत्रों की मानें तो निकाय चुनाव में बीजेपी और कुकर समर्थक पदाधिकारियों के बीच तालमेल बैठने के आसार बेहद कम नजर आ रहे हैं। विधानसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को शिकस्त देने के लिए कुकर कार्यकर्ताओं ने जो बगावती रुख अपनाया था, उसका मलाल मूल बीजेपी कार्यकर्ताओं को आज भी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या निकाय चुनाव में कुकर गुट अपनी अलग रणनीति से बीजेपी के स्थापित नेताओं पर भारी पड़ेगा..? या फिर अंदरखाने की यह गुटबाजी खुलकर सड़कों पर आएगी..? क्या कुकर गुट से नगर निकाय चुनाव में ज्यादा उम्मीदवार उतारे जाएंगे या फिर भाजपा के उम्मीदवार ज्यादा उतरेंगे..? कांग्रेस की कलह का फायदा उठाने के बजाय बीजेपी को अपने ही कुनबे को एकजुट रखने की चुनौती झेलनी पड़ सकती हैं। गत विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों गुटों के बीच दूरियां इतनी बढ़ चुकी थी कि एक ही प्लेटफॉर्म से चुनाव लड़ना अब टेढ़ी खीर साबित हो सकता हैं। चित्तौड़गढ़ नगर निकाय चुनाव में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विरोधी दल से ज्यादा अपनों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की है। अगर कुकर और बीजेपी के बीच की यह टीस दूर नहीं हुई, तो इस अंदरूनी जंग का सीधा असर निकाय चुनाव के नतीजों पर देखने को मिल सकता है। अब देखना होगा कि बीजेपी आलाकमान इस गुटबाजी पर कैसे लगाम लगाता है या फिर चित्तौड़गढ़ में कुकर की सीटी एक बार फिर नए राजनीतिक समीकरण बनाएगी।

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